Saturday, January 28, 2017

Beti ki chah | Part2

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क्या मतलब? मै समझी नही ''यार, मतलब सीधा सा है. ऑपरेशन कराने का आइडिया फिलहाल कैंसिल. एक बार और कोशिश करते हैं शायद हमारी इच्छा पूरी हो जाए, कहते हुए दीपक ने मुझे बाहों मे भर लिया, माँ ने शर्मा कर मुँह फेर लिया और पूछ बैठी, “अगर अब की बार भी बेटा हुआ तो?”
जैसे  अल्ट्रासाउंड करा कर लोग लड़की का गर्भपात करा देते हैं , हम लड़के का गर्भपात करा देंगे, “ क्या गर्भ मे लड़का हुआ तो गर्भपात करा दोगे ? “ क्यूँ इसमे इतना आश्चर्य करने की क्या बात है ? गर्भ मे लड़की होने पर लोग गर्भपात कराते ही हैं क्यूंकी उन्हे लड़का चाहिए! हमे लड़की चाहिए, इसलिए अगर गर्भ मे लड़का हुआ तो हम गर्भपात करा देंगे, लोग सुनेगे तो क्या कहेंगे ? “कहने दो क्या फ़र्क पड़ता है, बच्चे हमे पालने है, इसलिए हम यह तय करेंगे की हमे लड़का चाहिए या लड़की,  दूसरे कौन होते हैं इस मामले मे दखल देने वाले ? दीपक के इस तर्क के आगे मैं निरुत्तर हो गई थी! तभी दीपक ने मुझे पकड़ कर बिस्तर पर लिटा कर बत्ती बुझा दी और मेरे अधरो पर अपने अधरो को रखते हुए फुसफुसाए- अच्छे काम मे देर नही करनी चाहिए. जितनी जल्दी हो वही अच्छा, दिन, सप्ताह और महीने इसी तरह बीतने लगे,उस घटना के लगभग 6 माह बाद मेरे पीरीएड्स बंद हो गये, मैने जब दीपक को यह बात बताई तो वो मुस्कुराते हुए बोले, “इस का मतलब हमारी मेहनत का फल हमे मिलने वाला है, फल लेने से पहले बहुत कुछ करना पड़ता है. पहले तैयारी करो अस्पताल चल कर चेकअप कराने  की- "हाँ-हाँ क्यू नही"

अगले ही दिन हम अस्पताल गये, वहाँ चेकअप करने के बाद डॉक्टर ने बताया की अभी गर्भ मात्र 4 माह का है और सब कुछ ठीक-ठाक है, अभी अल्ट्रासाउंड कर गर्भ के लिंग का पता नही चल सकता, हम दोनो खुशी-खुशी घर लौट आए, हमारी मनोकामना जो पूरी होने वाली थी! मम्मीजी को यह समझते देर न लगी की क्या बात है. उन्होने मुझ से बस , इतना ही पूछा, सब ठीक ठाक तो है न? हाँ मम्मीजी सब ठीक है; मेरे इस जवाब से वो संतुष्ट हो गई थी अब मम्मीजी पहले से भी ज़्यादा ख़याल रखने  लगी थी. यह खा लो, वो खा लो, यह मत करो, वो मत करो, हर दम लगाए रहती, कभीकभी तो मुझे उनकी इन बातों पर हँसी आ जाती और मै कह उठती, “अरे मम्मीजी, मै पहली बार तो माँ बन नही रही हूँ, पहले भी 2 बेटे पैदा कर चुकी हूँ; हाँ-हाँ मुझे पता है पर यह मत भूल की बच्चे को जन्म देने मे हर बार माँ का नया जन्म होता है और तुझे कुछ हो गया तो मेरा बेटा तेरे गम मे जीते जी मर जाएगा, फिर मेरा क्या होगा ? यह कह कर मम्मीजी हंस पड़ती और मै भी अपनी हँसी रोक न पाती. इसी तरह समय हँसी खुशी बीतता रहा और अंत मे वो घड़ी आ ही गई  जब मेरे गर्भ मे पल रहे भ्रूण का लिंग का पता चलना था मै और दीपक दोनो यही चाहते थे की लड़की ही हो, क्यूंकी मुझे यह पता था की अगर लड़का हुआ तो दीपक गर्भपात कराने से नही मानेगे  और यही कहेंगे  की शायद अगली बार लड़की हो. मैं अब इस गर्भ धारड़ के मे नही पड़ना चाहती. उस दिन हम सुबह सुबह ही नहाधोकर नाश्ता कर धड़कते दिल से नर्सिंग होम पहुँच बच्चों को जितना अपना परिच्छा परिणाम जानने की उत्सुकता होती है उससे कहीं ज़्यादा हम उत्सुक थे हम इतने अधीर थे की हमे लगता था की कितनी जल्दी कोई आए और हमे यह बताए की आप लड़की की माँ बनने वाली हैं,लेकिन होता सब कुछ समय से ही है ! नर्सिंग होम मे डॉक्टर के आने के बाद लगभग डेढ़-घंटे का समय अल्ट्रासाउंड मे ही लग गया ! इसके बाद हमे कमरे से बाहर जाने को कहा गया की बाहर चल कर बैठिए, थोड़ी देर मे आप लोगों को बता दिया जाएगा! हमारे लिए एक-एक पल बिताना भारी पड़ रहा था पर कर ही क्या सकते थे! थोड़ी देर मे एक नर्स मुस्कुराती हुई कमरे से निकली और हमारे पास आकर बोली, बधाई हो मि. दीपक एंड मिसेज़ दीपक; आप लोग बेटे के माँ बाप बनने वाले हैं ! लाइए मेरी बखशीश. यह खबर सुनकर एक ही झटके मे हमारे सपनो का महल चूर हो गया था दीपक तो सिर पकड़ कर वही बैठ गये!
क्रमशः

Wednesday, January 25, 2017

Hindi kahani - Beti ki chah

मेरी ज़िंदगी बड़े मज़े की चल रही थी, 30 बरस की छोटी सी उम्र मे मानो मुझे सब कुछ मिल गया था सुंदर सुशील कमाऊ और सब से बड़ी बात तो यह की मुझे अपनी जान से भी अधिक चाहने वाले पति दीपक मिले थे दीपक एक कंपनी मे प्रबंधक थे जहाँ से उन्हे प्रतिमाह 25 हज़ार रुपये वेतन मिलता था शादी के बाद मेरी यह इच्छा जताने पर की मै भी नौकरी करना चाहती हूँ ,ना तो मेरे पति और न ही मेरी सास ने कोई आपत्ति की थी बल्कि दीपक ने अपनी कंपनी मे कह कर मेरे लिए नौकरी का प्रबन्ध भी कर दिया था दोनो की सम्मिलित आय से घर का खर्च आराम से चल जाता था और ठीक ठाक बचत भी हो जाती थी सास ऐसी थी जो मुझे बहू नही बल्कि अपनी बेटी समझती थी और मुझे बेटी कहकर ही पुकारती थी. दीपक उनकी इकलौती औलाद थे कोई बेटी न थी वह अपनी बेटी की चाह मुझे देख कर ही पूरी करती थी ससुर गावों गाव मे रहते थे उन्हे महानगर पसंद न था अच्छी ख़ासी खेती बाड़ी थी सो वह गाव मे ही रहकर खेती संभालते थे सास यह सोचकर कि बेटेबहू अकेले कैसे महानगर मे रहेंगे हमारे साथ ही रहती थी शादी के बाद हर लड़की की इच्छा होती है, कि वह माँ बने मेरी ये इच्छा भी जल्द पूरी हो गई थी शादी के केवल 5 साल के भीतर ही मेरे दो बेटे हो गये थे, मुझ पर घर के किसी काम का कोई बोझ न था सास जिन्हे मै मम्मी जी कहकर पुकारती थी, ने कभी मुझे घर के किसी काम का बोझ महसूस ही नही होने दिया, दोनो बच्चो  को बड़ी हँसी-खुशी से संभालती थी, रोज़ सुबह 5 बजे ही उठ जाती थी, दूध लाना चाय-नाश्ता बनाना और हमारा टिफिन तैय्यार करना वो इतनी सहजता और तेज़ी से करती की स्वयं मैं चकित रह जाती, शाम का खाना मैं बनाती और सब हँसी-खुशी खाते, मम्मीजी वैसे तो रहने वाली गाव की थी पर उन्हे व्यावहारिक ज्ञान बहुत ! दूध लाना, सब्ज़ी लाना, बिजली पानी का बिल चुकाना, घरके ज़रूरत की चीज़े लाने से लेकर किराया देना आदि सभी काम वो बड़ी कुशलता से कर लेती, हम महीने के शुरू मे ही अपना वेतन लाकर उन्हे सौंप देते और निश्चित हो जाते पर वो महीना समाप्त होने के बाद बचे पैसों को मुझे लौटा देती और समझाती कि बेटा यही उम्र तो कमाने और बचाने की है, अगर मैं कहती की आप ही रख लीजिए तो वो यह कहते हुये  मना कर देती कि अपनी ज़िम्मेदारियाँ अभी से समझो उनके इतना सब करने की ही वजह थी, कि वो अगर गावो 10 दिन के लिए भी जाती तो हम परेशान हो जाते, दीपक तो उन्हें ट्रेन मे बिठाने के साथ वापसी का टिकट  भी खरीद कर दे देते!

पास पड़ोस की औरतें कभी-कभी मम्मीजी को भड़काती, ''अरे, माँ जी, यह उम्र आपकी काम करने की थोड़ी न है, थोडा पूजा-पाठ भजन-कीर्तन किया कीजिए, मम्मीजी तडसे जवाब देती, अपना घर संभालना ही सबसे बड़ा काम है. मैं पूजा-पाठ के ढकोसले मे नही पड़ती और न ही मुझे स्वर्ग जाने की लालसा है. तुम्ही लोग पुण्य कमाओ और स्वर्ग मे अपनी जगह पक्की करो. सब निरुत्तर होजाते इतना सब करने के बावजूद मम्मीजी कभी कोई फरमाइश नही करती उल्टे वो हम सब की ज़रूरतों का धयान रखती थी इसलिए मैं उनके लिए ज़रूरत की सभी चीज़े उनके मना करने पर भी खरीद लाती! कभी कभी मैं कहती थी की मम्मीजी, आप थक गई होंगी, लाइए यह काम मै कर दूं तो वो हंसते हुए कहती की अभी मेरी उम्र 50 की है, घर के काम करने से कोई थक थोड़ी न जाता है! मैं निरुत्तर हो जाती, ऐसे ही हँसी-खुशी दिन बीत रहे थे की दीपक एक रात बोले- संगीता 2 बेटे हो गये हैं! बच्चे पैदा करने से ज़्यादा महत्वपुर्य है, उनकी अच्छी देख-भाल और परवरिश करना उन्हे पढ़ा लिखा कर इस लायक बनाना की वो बड़े हो कर अपने पैरों पर खड़े होकर कमा खा सकें! आज के ज़माने मे दो बच्चे काफ़ी हैं! तुम्हारी अगर सहमति हो तो मैं आपरेशन करा लूँ, बात तो तुम सही कह रहे हो, तुम्हारी राय ही मेरी राय है. पर... “पर क्या”?
मेरी
शुरू से ही यह इच्छा रही थी की मेरे एक बेटी भी हो बेटी ही माँ की सुख दुख की सहभागी होती है और वही माँ का दुख भी समझ पाती है, बेटी बड़ी हो जाने पर माँ की सहेली की भूमिका निभाती है .  बेटी ना हो तो समझो घर का आँगन सूना ही रहता है. पर दोनो बार बेटे ही हुए. एक बेटी होती तो अच्छा होता. पर अब किया भी क्या जा सकता है. यार तुम तो बड़ी छिपी रुस्तम निकली, हमारे 2-2 बेटे हो गए पर तुमने अपने दिल की बात आज तक नही बताई, सच कहूँ तो तुम ने मेरे मुँह की बात कह दी, 2 बेटे हो और एक भी बेटी न हो तो यह अच्छी बात नही है, हमारे बेटी होगी तो वो तुम्हारी ही तरह सुंदर  होगी, आख़िर हमारी यह इच्छा भी अधूरी क्यूँ रहे? क्रमशः

Tuesday, January 17, 2017

भाग्य और भारतीय - सोच बदलो समाज बदल जाएगा

हम हज़ारों साल गुलाम क्यूँ रहें? 
इस सवाल के चाहे कितने भी कारण गिनायें जाए किंतु असली कारण हमारी भाग्यवादी सोच ही थी! ऐसी सोच के चलते ही हम गुलामी को अपनी तकदीर मान कर चुप चाप उसे स्वीकार कर लिया और गुलाम बनने को राज़ी हो गये, भाग्यवादी  व्यक्ति हर चीज़ को स्वीकार करता चला जाता है और उस के साथ वैसे ही ढलता चला जाता है! समाज में व्यक्ति के लिए केवल दो रास्ते उपलब्ध हैं. एक तो यह की यदि जीवन ग़लत है तो जीवन को बदलो. दूसरा यह की ग़लत जीवन के साथ समझौता कर लो. 
अपने देश के लोग अपनी भाग्यवादी सोच के चलते आमतौर पर दूसरा रास्ता ही चुनते हैं की जैसी भी स्थिति हो उसी के अनुसार खुद को ढाल लो . उस स्थिति को बालने का प्रयास बहुत कम ही लोग करते हैं यदि ग़रीब हैं तो ग़रीबी के साथ यह कह कर समझौता कर लेते हैं की भगवान जो दिया है हम तो उसी में खुश हैं हर व्यक्ति के भाग्या में जो भी लिखा है वही हो रहा है! कुछ अन्यथा नही. हम अपने पिछले जन्म के कर्मों का फल भोगने के लिए ही पैदा हुए हैं, इन्ही में बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपनी सफलताओं को बुरे ग्रहों का प्रभाव मान कर उन्हें पूजापाठ एंव दानदक्षिणा दे कर दूर करने के प्रयास में ही लगे रहते हैं, असफलता के कारणों के जान कर उन्हें दूर करने का प्रयास नही करते हैं, हमारी ऐसी सोच के कारण ही समाज में एक ऐसा परजीवी वर्ग बन गया है जो दानदक्षिणा प्राप्त कर के अपना जीवन मज़े से गुज़ार रहा है!
भाग्यवाद के कारण ही समाज में ऐसा वर्ग पैदा हो गया है, जो यह विश्वास करने लगा, "अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम, दास मलूका कह गये, सब के दाता राम", जहाँ तक मैं समझती हूँ  भिकारियों की जितनी संख्या भारत में है उतनी अन्या कहीं भी नही है ऐसा केवल इसीलिए है की लोगों के मन में यह धारणा बैठ चुकी है कि भिक्षा देने से पुण्या प्राप्त होता है और स्वर्ग में जाने का रास्ता साफ हो जाता हैं, भारत के लोगों ने एक यह भी भ्रम पाल रखा है कि हमारा अतीत तो बहुत उज्ज्वल था किंतु सचाई यह है की जितनें अधिक सुखी हम आज हैं उतने सुखी हम कभी भी किसी भी युग में नही रहे! 
चाहे वो सतयुग हो, चाहे द्वापर या त्रेता युग हो. कलियुग में ही लेगों ने जाना है कि सुख क्या होता है. हमारी आस्था कई प्रकार की ग़लत धारणाओं से बनी हुई हैं, दूसरे देशों के लोग नई नई खोजों से मानव आयु को बढ़ाने में लगे हुए हैं, रोगों को मिटाने में लगे हुए हैं और सफलता भी पा रहे हैं, किंतु भारत के लोग अभी इसी विश्वास में जी रहे हैं की आयु तो ईश्वर तय करता है, आज कई तरहा के भयंकार रोग या महामारियाँ नई नई दवाओं के कारण या तो समाप्त होती जा रही हैं या तो बहुत ही कम हो गयी हैं पहले इनके कारण लाखो लोग मार जाते थे, किंतु हम अभी भी यही राग अलापते जा रहे हैं, की ईश्वर ही बीमार करता है और वही बीमारी को दूर करता है 
अभी भी बहुत से लोगों की सोच अवैज्ञानिक ही बनी हुई है, लोग धर्म पुस्तकों में कही गयी बातों के अलावा और किसी व्यक्ति की बुद्धि को उसके विचार को और विकास को स्वीकार करने को सहज ही तय्यार नही हैं!
संसार में सुख का सृजन धर्म नें नही केवल विज्ञान और टेक्नोलौजी ने पैदा किया है भारत में स्वर्ग एंव मोक्ष का जो प्रचार किया गया उसका मुख्या कारण यही था कि लोग बहुत दुखी थे और उन्हें दुखों से निकलनें का कोई रास्ता दिखाई नही देता था, हिंदुओं की धार्मिक पुस्तकें दुख को जीवन का केंद्र मान कर ही लिखी गयी जान पड़ती हैं 
क्योंकि पुराने लोगों ने सुख का अनुभव बहुत ही कम किया है विज्ञान और टेक्नोलौजी ने ही मानव के लिए सुख भोगने के अवसर प्रदान किए नयी खोजों ने व्यक्ति के देखनेसूनने और चलने की क्षमता को कई गुना अधिक बड़ा दिया. बिजली का अविष्कार एव सूचनातंत्र के अविष्कारों से पूरे संसार को ही बदल दिया है. आज दुनिया मे कोई व्यक्ति दुखी है तो केवल अपनी कमियों एव अभाव के कारण ही है. सभी दुखों को दूर करने के साधन तो अब पैदा कर ही लिए गये हैं यदि कभी वर्षा का अभाव हो जाए तो पश्चिम के लोग कृत्रिम वर्षा करवा लेते हैं किंतु भारतीय लोग वर्षा ना होने पर हवन यगया करने बैठ जाते हैं. हज़ारों सालों से ऐसा ही करते चले आ रहे हैं. पश्चिम के लेगों ने विज्ञान एंव तकनीक की सहायता से अपनी औसत आयु बढ़ा ली है. रोगों पर नियंत्रण पा लिया है, किंतु हम अभी भी 
भाग्या को लेकर बैठे हुए हैं. 
जब सोमनाथ मंदिर पर गजनी ने आक्रमण किया तो वहाँ पाँच सौ पुजारी थे. उनकी यह मान्यता थी की जो ईश्वर सब की रक्षा करता है क्या वह उनकी या अपनी रक्षा नही करेगा. पुजारी प्रार्थना करते रहे और गजनी सबकुछ लूट कर ले गया. यह केवल अंधविश्वास है, कोई वैज्ञानिक चिंतन नही लोगों की भाग्यवादी सोच को बढ़ावा देने के लिए शासक वर्ग ने धर्म की आड़ में खूब प्रचार किया ताकि जनता उनके कुशासन एंव शोषण के खिलाफ विद्रोह की ना सोचे आज भी कई पत्रपत्रिकाएँ भविष्याफल छाप कर लोगों की ऐसी सोच को ही बढ़ावा दे रही हैं बहुत सी पत्रपत्रिकाओं में दैनिक, साप्ताहिक, मासिक एंव वार्षिक भविष्यफल छापे जाते हैं! 
मंत्रिमंडल के शपथग्रहण जैसे कार्य भी शुभ मुहूर्त निकलवा कर ही किए जाते हैं, जिससे ज्योतिषियों को खूब प्रोत्साहन मिलता है, मज़े की बात यह है की बुरे भाग्य को बालने के लिए भी रास्ते सुझाए गये है जिनमे दान-दक्षिणा मुख्य है कोई भी समझदार वयक्ति दान-दक्षिणा के उपाय को जानकार बड़ी आसानी से अनुमान लगा सकता कि यह केवल उन्हे ठगने का प्रयास भर है. दान-दक्षिणा में धन के अलावा सोना, चाँदी, हीरा, मोती, गेहूँ, चावल, गुड, चीनी, भूमि और गाय जैसी वस्तुओं को देने का प्रावधान किया गया. ग्रहों की शांति के लिए दो हज़ार से ले कर सवा लाख तक मंत्र का जाप करने को कहा जाता है ताकि धनी लोग समय के अभाव के कारण पंडित को ही उनके लिए मंत्र जपने को कह दें और बदले में मोटी दक्षिणा दें. बड़ी चालाकी से लोगों को ग्रह शांति के नाम पर ठगा जाता है और भयदोहन सिद्धांत का पूरा पूरा लाभ उठाया जाता है. हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए की भारत में धर्म कभी नही रहा हैं. केवल दर्शिनिक विचारधारायें रही है 

Monday, November 28, 2016

आज के युग में क्षमा का औचित्य?

दुसरो की गलतियां गिनाना, उन्हें खरी खोटी सुनाना, सम्बन्ध तोड़ लेना, ये सब कितना सहेज है! ऐसा करने में हमें ज़रा भी वक़्त नहीं लगता मगर जब बात माफ़ करने की आती है तो हमारे ज़हन में हज़ारो सवाल कौंधने लगते है, कही क्षमा करने का उल्टा असर तो नहीं होगा? वह मुझे कमज़ोर तो नहीं समझेगा? भला अपना अपमान कैसे भूल जाऊ? आदि मगर ऐसी कितनी ही हस्तिया हुई है, जिन्होंने दुसरो को माफ़ करने में पलभर का भी वक़्त नहीं लगाया! अश्वेत नेल्सन मंडेला जी को ही ले लीजिये, दक्षिण अफ्रीका में असमानता और जाति भेद ख़त्म करने की लड़ाई में उन्हें सालो कैदखाने में रहना पड़ा! वहाँ के जेलर ने उन्हें कई तरह से प्रताड़ित भी किया, फिर भी जेल से छूटने के बाद उन्होंने सम्मान समारोह में जेलर को आमंत्रित करने के लिए सरकार पर जोर डाला था, इतना ही नहीं अपने समाज के लोगो से गोरो को माफ़ करने की गुज़ारिश भी की थी!
smsduniya

जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति क्लिंटन ने नेल्सन मंडेला से पूछा की "क्या आपको अपने साथ हुए अनयाये पर क्रोध नहीं आया? तो उनका जवाब था, हाँ- मुझे क्रोध आया था, थोड़ा डर भी गया था, आखिर मैं लंबे समय तक आज़ाद जो नहीं हुआ था! लेकिन मैंने महसूस किया कि अगर मैं उनसे नफरत करता रहा तो जेल से बाहर आने के बाद भी वो मेरे साथ ही रहेंगे! जबकि मैं पूरी तरह से आज़ाद होना चाहता था! इसलिए मैंने इस घटना को भुला दिया, ये एक हकीकत है "दूसरे को क्षमा न करने का मतलब है, उसके साथ साथ खुद का नुकसान करना"
बदला लेने की प्रव्रत्ति व्यक्ति और समाज, किसी के लिए भी फायदेमंद नहीं, समझदारी क्षमा करने में ही है, क्योंकि दूसरो को सजा देने के क्रम में व्यक्ति को अपने हितो का भी गाला घोटना पड़ता है!
कैसी प्रतिकिर्या करते है आप?
आइये गौर करे ज़िन्दगी के उन लम्हो पर जब आपका दिल किसी के लिए नफरत और क्रोध से भर उठता है, तब क्या करते है आप और उससे क्या हासिल होता है?
खरी-खोटी सुनना - पहली प्रतिकिर्या तो यही होती है की आप उस बन्दे को जी भर के बुरा भला कह लेते है, लताड़ते है, क्रोध में चिल्लाते है, पर इससे हासिल क्या होता है? तनाव बढ़ता है, ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है! क्रोध के उफान में ही अक्सर हार्ट अटैक के दौरे भी पड़ जाते है! साथ ही जिस पर आप चिल्लाते है वह आपके प्रति दुर्भावना रखने लगता है!
रिश्ता तोडना - दूसरी प्रतिकिर्या होती है बातचीत बंद करना, मगर व्यवहारिक नज़रिये से देखा जाये तो इसमें भी घाटा आपका ही है! आज की दुनिया में कब कौन काम आ जाये, कहा नहीं जा सकता, जितने ज़्यादा लोगो से मधुर सम्बंध होंगे उतना फायदेमंद होगा, अब्राहम लिंकन ने ठीक ही कहा था, "एक गैलेन सिरके की जगह 1 बून्द शहद से ज़्यादा मक्खियां पकड़ी जा सकती है!" ज़ाहिर है रिश्तो में कड़वाहट बढ़ाने के बजाये क्षमा के शहद से मिठास घोलना ज़्यादा बेहतर है!
बदला लेना - कुछ लोग ताउम्र दूसरो को क्षमा नहीं करते और हमेशा बदले की फ़िराक में रहते है, ये भी एक तरह से घाटे का सौदा है! अक्सर बदला लेने के क्रम में व्यक्ति दूसरो के साथ-साथ खुद को भी बर्बाद कर लेता है, क्या इस तरह टाइम एनर्जी और लाइफ वेस्ट करने से बेहतर माफ़ करना नहीं?
घुटते रहना - दूसरो की कुछ बाते दिल को चोट पहुचती है, ऐसे ज़ख़्म तब नासूर बन जाते है जब आप रह रह कर उसे कुरेदते है या मन ही मन घुटते रहते है, इसका इलाज बहुत कठिन हो जाता है!
क्या करे -
क्षमा करे - दूसरो को माफ़ कर दे बेशक ये सहेज काम नहीं है, पर खुद के और समाज दोनों के हित में है! बकौल नेल्सन मंडेला "जब हम क्षमा करते है तो ये 3 तरह से काम करता है! पहला क्षमा करके हम अपनी वास्तविक पहचान बनाये रखते है, दूसरा समाज में एकता के प्रति संघठन की स्तिथि उत्पन करते है " तीसरा, युवा पीढ़ी के लिए एक आदर्श के रूप में सामाजिक मूल्यों को निरंतरता देना! क्षमा करने का ये अर्थ बिलकुल नहीं कि आप सामने वालो की नज़रो में छोटे या कमज़ोर हो गए, वस्तुतः क्षमा तो बड़प्पन और उदारता की पहली निशानी है! महात्मा गाँधी जी का अहिंसा का सिद्धान्त भी क्षमाशील से ही प्रेरित था!
कैसे करे क्षमा ? सबसे पहले ज़रूरी है, मन को शांत रखे, जब भी क्रोध आये तुरंत प्रतिकिर्या न करे! खुद को काबू रखने का प्रयास करे! हो सके तो उस स्थान या व्यक्ति से दूर हो जाये जिस पर आपको क्रोध आ रहा है!
कुछ देर के लिए अपने अहं को दरकिनार करते हुए, दूसरे के पक्ष में विचार करे, खुद को उसकी जगह रख कर देखे! बहुत से मामलो में आपको अहसास होगा कि उसकी परिस्तिथयो में अगर आप होते तो शायद आप भी वैसा ही करते, जैसा उसने किया! अक्स हम दूसरे की 1 गलती के आगे उसकी हज़ार खूबियों को भूल जाते है! याद करे जिस व्यक्ति ने आपको चोट पहुचाई है, पहले कई दफा वो आपके काम भी आया होगा तो क्या वो क्षमा का अधिकारी नहीं है! मन में यकीन रखे यदि आप सही है तो अंततः जीत आपकी ही होगी, भला फिर बाधा उत्पन्न करने वालो से कैसी दुश्मनी? सच तो ये है कि वो आपकी राह में रोड़े अटका कर आपको और समर्थ और मज़बूत बना रहे है! माफ़ करने की आदत बचपन से ही डालनी ज़रूरी है! घर और स्कूल में यदि बच्चो में शुरू से माफ़ करने कि आदत विसकसित की जाये तो आगे जा कर वे समाज को आदर्श रूप दे सकेंगे! क्षमा करने की प्रवित्ति हमारे मन को ईर्ष्या, द्वैश, क्रोध से मुक्त कर स्वछ बनाती है! जब हम किसी व्यक्ति को क्षमा करते है तो मनको उसके लिए निरंतर चलने वाली नकारात्मक भावनाओ के बोझ से मुक्त कर देते है! हम फ़िज़ूल ही अपनी क्रोध, नाराज़गी, शिकायत आदि पर अपनी ऊर्जा बर्बाद करने से बच जाते है और इस ऊर्जा का इस्तेमाल अपनी उन्नति और बेहतरी में कर सकते है! यदि कोई व्यक्ति आपके साथ बुरा करता है और आप उसके साथ वैसे ही करके निकलना चाहते है तो फिर आपमें और उसमे क्या अंतर रह जायेगा? किसी दूसरे की वजह से अपने आदर्श या अपनी पहचान बदलना क्या आपकी हार नहीं? दूसरो को क्षमा कर अपनी उदारता दिखाए मगर हाँ कभी स्वाभिमान को ठेस न पहुँचने दे!

Monday, November 21, 2016

चुलबुला सफर

आजकल ढेर सारे कार्टून टीवी पर आ रहे है पर एक कार्टून ऐसा है जो हर उम्र के लोगो को सालो से भा रहा है और वो है टॉम एंड जेरी, उम्र कोई भी क्यों न हो, टॉम एंड जेरी कार्टून हर किसी को अच्छा लगता है! जेरी की प्यारी सी शरारत और टॉम का जेरी के पीछे हाथ धो कर पड़े रहना, एक दूसरे को चिढ़ाने और मज़ा चखाने के लिए तरह-तरह की तरकीबे अपनाना और एक दूसरे की मदद भी करना इन दोनों पत्रो की खासियत है, जो इंसानो को भी बहुत कुछ सीखा जाती है! कुल मिलकर इन दोनों की चुलबुली शरारते गम्भीर लोगो को भी हंसने पर मजबूर कर देती है!
Tom and Jerry- SMSDUNIYA

ग्रे रंग की हरदम चौकन्नी रहने वाली बिल्ली और एक भूरे रंग का चूहा, मौका मिला नहीं कि टॉम को ज़रा सा छेड़ दिया और तब शुरू होता है चूहे और बिल्ली का खेल टॉम एंड जेरी, पलक झपकते ही एक दूसरे को सबक सिखाने के लिए वे एक से बढ़ कर एक तरकीब निकलते है!
कभी टॉम हमलावर है तो कभी बचाओ की रणनीति अपनाता है तो कभी कभी टॉम को ही बचाओ की नीति का सहारा लेना पड़ता है! रसोई का सारा सामान, डाइनिंग टेबल पर कप प्लेट और कप बोर्ड में क्रोकरी झनझना कर चूर हो जाती है! गरम आयरन लेकर मैराथन दौड़ चलती है, ऐसे में बड़े अपना सिर पीटते है और बच्चे मन ही मन सोचते है है कि काश, उन्हें भी यह छूट मिल जाती! टॉम बेचारा कितनी ही बड़ी रणनीति के तहत जेरी से क्यों न लड़े, जीत हमेशा जेरी की ही होती है! जेरी के रचनाकार कही कही इसमें कुछ मानवीय गुण दिखा देते है जबकि टॉम स्वार्थी और मौकापरस्त चरित्र का है, टॉम मज़बूत है और जेरी निरीह प्राणी, यही कारण है कि जेरी के पक्ष लेने वालो कि संख्या टॉम के चाहने वालो से कही ज़्यादा है, टॉम एंड जेरी कार्टून कितना ही पुराना क्यों न हो जाये हर उम्र को गुदगुदाता है, पर सबको गुदगुदाने वाली इस जोड़ी के जन्मदाता के बारे में कुछ गिने चुने लोग ही जानते है! आज हम आपको टॉम एंड जेरी के जन्मदाता के बारे में बताएँगे, रोलैंड जोसेफ बारबेरा और विलियम हन्ना, इन दोनों प्यारे पात्रो के जनक है! बारबोरा का जनम 1911 में न्यूयॉर्क में और हन्ना का जन्म 1990 में न्यू मैक्सिको के मेलरोज में हुआ था! 2 अलग अलग परिस्तिथियो और परिवेश से आ कर दोनों एक जगह मिले, शुरू में बारबेरा एक बैंक में जॉब करते थे पर 1931 में बारबेरा को हालात ने MGM कंपनी के कार्टून विभाग में पंहुचा दिया और यहाँ शुरू के दिनों में बारबेरा ने महज पटकथा लिखने का काम किया! बाद में वो एनिमेटर बने, इस दौरान बारबेरा का परिचय हन्ना से हुआ!
हन्ना इंजीनियरिंग में अपना करियर सवारना चाहते थे, क्योंकि उन्होंने इंजीनियर बनने का सपने मन में सजोया हुआ था! पर विभिन्न कारणों से हन्ना कि पढ़ाई बीच में ही छूट गयी और वो एनीमेशन के क्षेत्र में जोड़ गए! हन्ना के हाथो में चित्रकारी का हुनर था और उसी हुनर  को काम में लगाने के लिए उन्होंने एक एनीमेशन स्टूडियो में काम शुरू किया! यहाँ 7 साल तक काम करने के बाद कुछ अच्छे मौके की तलाश में उन्होंने MGM कंपनी का रुख किया, यही से शुरू हुई बारबेरा और विलियम  की जुगलबंदी!
1993 में टॉम एंड जेरी के नाम से कार्टून शुरू हुआ, इसके बाद तो "टॉम एंड जेरी" शीर्षक के तहत 18 साल में दोनों ने मिलकर कोई 200 से भी अधिक एनीमेशन फिल्मो का निर्माण किया! शुरुआती दिनों से ही दुनिया भर में धूम मच गयी, "टॉम एंड जेरी" को बेस्ट शार्ट सब्जेक्ट श्रेणी के 7 आस्कर पुरस्कार मिले! 
1957 में बारबेरा ने एक अलग कंपनी बनाकर "टॉम एंड जेरी" को बाजार में देना शुरू किया, पुराने समय में ये सिनेमा हाल में कार्टून दिखाया जाता था, बाद में टेलीविज़न का ज़माना आया! तब तो ये कार्टून टेलीविज़न के माध्यम से घर घर तक पहुच गया! हॉलीवुड के जन्म के बाद से लेकर अब तक लगभग 77 साल होने को आये पर टॉम एंड जेरी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आयी! वही बिल्ली से चूहे की कभी ख़तम न होने वाली दुश्मनी भी जारी है! टॉम की नज़र अपने हर एक शिकार पर है फिर चाहे वो जेरी हो, बत्तख हो या गोल्ड फिश ही क्यों न हो, जो कभी टॉम के हाथ तो लगता नहीं है साथ ही टॉम किसी और के हाथ भी नहीं लगने देता! सदियो से बेचारा टॉम आज भी अपना शिकारी धर्म को निभाते हुए इसमें प्रयासरत है और जेरी अपनी मासूम शक्ल से लोगो को प्रभावित करने में लगा हुआ है!