Tuesday, January 31, 2017

Beti ki chah | Last Part

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मेरा चेहरा भी उतर गया था ! नर्स कुछ समझ ही पाई की माजरा क्या है ? और वो पूछ ही बैठी , क्या बात है? यह खबर सुन  कर आप लोगों को खुशी नही हुई ! तबीयत ठीक नही है क्या ? बड़ी मुश्किल से मै उसे बता पाई, दरअसल हम लड़की चाहते थे ! लड़के तो 2 हमारे पास पहले से हैं, क्या ? आप लोग लड़की चाहते हैं ! यहाँ तो लोग आते हैं यह पता करने की लड़का होगा या  नही और लड़की होने की खबर मिलते ही गर्भपात करा देते है ! मै ने तो पहली बार ऐसा देखा  कमाल है भाई, कहती हुई नर्स कंधे उचका कर बाहर निकल गई! नर्स के जाने के बाद दीपक बोले, लड़का या लड़की होना अपने बस मे तो है नही ! ऐसा करता हूँ की डॉक्टर से गर्भपात की बात करता हूँ, जो काम करना है करना है! बेकार का समय खराब करने से क्या फ़ायदा ?
नर्सिंग होम वालों को क्या चाहिए, पैसा वे गर्भपात करने को तुरंत तय्यार हो गये ! मात्र  2 घंटे मे हमे अनचाहे गर्भ से छुटकारा मिल गयामुझे काफ़ी कमज़ोरी महसूस हो रही थी और चक्कर भी आरहे थे! दीपक ने एक टेक्सी बुलाई और मुझे पकड़ कर बिठाया औरथोड़ी ही देर मे हम अपने घर पहुँच गएथे ! मेरी हालत देख कर मम्मीजी को सब कुछ समझते देर लगी और वो मेरी देख-भाल मे जुट गई ! उन्होने तत्काल कुछ पूछना ठीक समझा! उनकी देखभाल से मेरी हालत 3-4 दिन मे ही काफ़ी सुधर गई और मै उठकर अपना सब काम करने की हालत मे होगई थी! दीपक भी दफ़्तर जाने लगे थे! उस दिन दोपहर मे मम्मीजी ने बात कुछ इस तरह शुरू की, अच्छा किया गर्भपात करा दिया लड़की थी कौन लड़की के पछदे मे पड़ेउसे पैदा करो पालोपोसो और फिर पढ़ा लिखा कर घर उजाड़ कर दहेज दो! ज़िंदगी भर देते रहो फिर भी कम ही रहता है! लड़की नही लड़का था, मेरे मुँह से निकला! लड़का था फिर क्यूँ गर्भपात करा दिया ? कोई गड़बड़ थी क्या ? ''गड़बड़ कोई नही थी, लड़के हमारे पास पहले से 2 थे अब हम एक लड़की चाहते थे! इसलिए लड़का हाथ से गँवा दिया तुम लोगों का दिमाग़ तो नही खराब हो गया, मम्मीजी का स्वर एकदम अचानक तेज़ और तीखा हो चला था! उनका यह रूप देख कर मै तो डर ही गई और जान बचाने की गरज से जा कर अपने कमरे मे लेट गई! मम्मीजी न जाने कितनी देर तक गुस्से मे बड़बड़ाती रही ! रोज़ की तरह शाम को मै रसोई मे घुसकर खाना बनाने लगी! दीपक के दफ़्तर से लौट कर आने के बाद मैने सारी बाते बताई सुनने के बाद दीपक हंसते हुए बोले, चिंता मत करो, मै सब संभाल लूँगा और मम्मीजी के कमरे मे बाते करने चले गये, रात खाना खाने के लिए मै बुलाने गई तो माँ बेटे खाने साथ-साथ आए पर एक तरह का आबोलापन ही हावी रहा खाना खाने के बाद दीपक फिर मम्मी जी के पास ही चले गये और रात को कब लौटे पता ही ना चला!
सुबह मेरी हिम्मत पड़ी की मै मम्मीजी से कुछ कहूँ या मांगू, मैं अपनी मर्ज़ी से उठी और रसोई मे जाकर अपना नाश्ता ले आई दीपक के चले जाने के बाद मम्मीजी मेरे कमरे मे आई और बोलीबेटी तुम मुझ से नाराज़ हो, अरे पगली माँ की बात का कोई बुरा मानता है क्या? कल गुस्से मे जाने मैं क्या- क्या कह गई? नही मम्मीजी मैं नाराज़ क्यूँ  होने लगी? आप से नाराज़ हो कर मै कहाँ जाऊंगी? मेरे मुँह से स्वर फूटे. कल रात को मुझे दीपक ने समझाया की अब बच्चे भगवान की देन नही रह गये! बच्चे पैदाकरना अब आदमी के हाथ मे हो गया है! अब लड़का-लड़की मे कोई फ़र्क भी नही रह गया है, हमारे 2 लड़के पहले से ही थे अब हमे लड़की चाहिए थी ! सो हम ने लड़के का गर्भपात करा दिया  फिर लड़कियाँ नही होंगी तो लड़के कहाँ से होंगीमाँ फिर तुम भी तो किसी की बेटी थी अगर तुम होती तो मैं कहाँ से होता? और उस के इस वाक्य ने मुझे निरुत्तर कर दिया और मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो गया, तुम लोगो ने जो किया ठीक ही किया, बेटी कल मैने तुम्हे गुस्से मे जो कुछ कहा उसके लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूँ, कहते हुए मम्मी जी के आँखों मे आँसू गये!

अरे मम्मी जी यह आप क्या कह रही है? शर्मिंदा तो हमे होना चाहिए की हमने आपसे बिना पूछे  इतना बड़ा निर्णय ले लिया, अगर हमने आपसे पहले ही बात कर ली होती तो यह नौबत ना ही आती! कृपया हमे माफ़ कर दीजिए, मेरा इतना कहना था की मम्मी ने आगे बढ़ कर मुझे गले लगा लिया और बहते आँसुओ मे सारे गले शिकवे बह गये!
-समाप्त

Saturday, January 28, 2017

Beti ki chah | Part2

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क्या मतलबमै समझी नही ''यारमतलब सीधा सा हैऑपरेशन कराने का आइडिया फिलहाल कैंसिलएक बार और कोशिश करते हैं शायद हमारी इच्छा पूरी हो जाएकहते हुए दीपक ने मुझे बाहों मे भर लियामाँ ने शर्मा कर मुँह फेर लिया और पूछ बैठी, “अगर अब की बार भी बेटा हुआ तो?”
जैसे  अल्ट्रासाउंड करा कर लोग लड़की का गर्भपात करा देते हैं , हम लड़के का गर्भपात करा देंगे, “ क्या गर्भ मे लड़का हुआ तो गर्भपात करा दोगे ? “ क्यूँ इसमे इतना आश्चर्य करने की क्या बात है ? गर्भ मे लड़की होने पर लोग गर्भपात कराते ही हैं क्यूंकी उन्हे लड़का चाहिएहमे लड़की चाहिएइसलिए अगर गर्भ मे लड़का हुआ तो हम गर्भपात करा देंगेलोग सुनेगे तो क्या कहेंगे ? “कहने दो क्या फ़र्क पड़ता हैबच्चे हमे पालने हैइसलिए हम यह तय करेंगे की हमे लड़का चाहिए या लड़की,  दूसरे कौन होते हैं इस मामले मे दखल देने वाले ? दीपक के इस तर्क के आगे मैं निरुत्तर हो गई थीतभी दीपक ने मुझे पकड़ कर बिस्तर पर लिटा कर बत्ती बुझा दी और मेरे अधरो पर अपने अधरो को रखते हुए फुसफुसाएअच्छे काम मे देर नही करनी चाहिएजितनी जल्दी हो वही अच्छादिनसप्ताह और महीने इसी तरह बीतने लगे,उस घटना के लगभग 6 माह बाद मेरे पीरीएड्स बंद हो गये, मैने जब दीपक को यह बात बताई तो वो मुस्कुराते हुए बोले, “इस का मतलब हमारी मेहनत का फल हमे मिलने वाला हैफल लेने से पहले बहुत कुछ करना पड़ता हैपहले तैयारी करो अस्पताल चल कर चेकअप कराने  की- "हाँ-हाँ क्यू नही"

अगले ही दिन हम अस्पताल गयेवहाँ चेकअप करने के बाद डॉक्टर ने बताया की अभी गर्भ मात्र 4 माह का है और सब कुछ ठीक-ठाक हैअभी अल्ट्रासाउंड कर गर्भ के लिंग का पता नही चल सकताहम दोनो खुशी-खुशी घर लौट आएहमारी मनोकामना जो पूरी होने वाली थीमम्मीजी को यह समझते देर  लगी की क्या बात हैउन्होने मुझ से बस , इतना ही पूछासब ठीक ठाक तो है हाँ मम्मीजी सब ठीक हैमेरे इस जवाब से वो संतुष्ट हो गई थी अब मम्मीजी पहले से भी ज़्यादा ख़याल रखने  लगी थीयह खा लोवो खा लोयह मत करोवो मत करोहर दम लगाए रहतीकभीकभी तो मुझे उनकी इन बातों पर हँसी  जाती और मै कह उठती, “अरे मम्मीजीमै पहली बार तो माँ बन नही रही हूँपहले भी 2 बेटे पैदा कर चुकी हूँहाँ-हाँ मुझे पता है पर यह मत भूल की बच्चे को जन्म देने मे हर बार माँ का नया जन्म होता है और तुझे कुछ हो गया तो मेरा बेटा तेरे गम मे जीते जी मर जाएगाफिर मेरा क्या होगा ? यह कह कर मम्मीजी हंस पड़ती और मै भी अपनी हँसी रोक  पातीइसी तरह समय हँसी खुशी बीतता रहा और अंत मे वो घड़ी  ही गई  जब मेरे गर्भ मे पल रहे भ्रूण का लिंग का पता चलना था मै और दीपक दोनो यही चाहते थे की लड़की ही होक्यूंकी मुझे यह पता था की अगर लड़का हुआ तो दीपक गर्भपात कराने से नही मानेगे  और यही कहेंगे  की शायद अगली बार लड़की होमैं अब इस गर्भ धारड़ के मे नही पड़ना चाहतीउस दिन हम सुबह सुबह ही नहाधोकर नाश्ता कर धड़कते दिल से नर्सिंग होम पहुँच बच्चों को जितना अपना परिच्छा परिणाम जानने की उत्सुकता होती है उससे कहीं ज़्यादा हम उत्सुक थे हम इतने अधीर थे की हमे लगता था की कितनी जल्दी कोई आए और हमे यह बताए की आप लड़की की माँ बनने वाली हैं,लेकिन होता सब कुछ समय से ही है ! नर्सिंग होम मे डॉक्टर के आने के बाद लगभग डेढ़-घंटे का समय अल्ट्रासाउंड मे ही लग गया ! इसके बाद हमे कमरे से बाहर जाने को कहा गया की बाहर चल कर बैठिएथोड़ी देर मे आप लोगों को बता दिया जाएगाहमारे लिए एक-एक पल बिताना भारी पड़ रहा था पर कर ही क्या सकते थेथोड़ी देर मे एक नर्स मुस्कुराती हुई कमरे से निकली और हमारे पास आकर बोलीबधाई हो मिदीपक एंड मिसेज़ दीपकआप लोग बेटे के माँ बाप बनने वाले हैं ! लाइए मेरी बखशीशयह खबर सुनकर एक ही झटके मे हमारे सपनो का महल चूर हो गया था दीपक तो सिर पकड़ कर वही बैठ गये!
क्रमशः

Wednesday, January 25, 2017

Hindi kahani - Beti ki chah

मेरी ज़िंदगी बड़े मज़े की चल रही थी, 30 बरस की छोटी सी उम्र मे मानो मुझे सब कुछ मिल गया था सुंदर सुशील कमाऊ और सब से बड़ी बात तो यह की मुझे अपनी जान से भी अधिक चाहने वाले पति दीपक मिले थे दीपक एक कंपनी मे प्रबंधक थे जहाँ से उन्हे प्रतिमाह 25 हज़ार रुपये वेतन मिलता था शादी के बाद मेरी यह इच्छा जताने पर की मै भी नौकरी करना चाहती हूँ ,ना तो मेरे पति और न ही मेरी सास ने कोई आपत्ति की थी बल्कि दीपक ने अपनी कंपनी मे कह कर मेरे लिए नौकरी का प्रबन्ध भी कर दिया था दोनो की सम्मिलित आय से घर का खर्च आराम से चल जाता था और ठीक ठाक बचत भी हो जाती थी सास ऐसी थी जो मुझे बहू नही बल्कि अपनी बेटी समझती थी और मुझे बेटी कहकर ही पुकारती थी. दीपक उनकी इकलौती औलाद थे कोई बेटी न थी वह अपनी बेटी की चाह मुझे देख कर ही पूरी करती थी ससुर गावों गाव मे रहते थे उन्हे महानगर पसंद न था अच्छी ख़ासी खेती बाड़ी थी सो वह गाव मे ही रहकर खेती संभालते थे सास यह सोचकर कि बेटेबहू अकेले कैसे महानगर मे रहेंगे हमारे साथ ही रहती थी शादी के बाद हर लड़की की इच्छा होती है, कि वह माँ बने मेरी ये इच्छा भी जल्द पूरी हो गई थी शादी के केवल 5 साल के भीतर ही मेरे दो बेटे हो गये थे, मुझ पर घर के किसी काम का कोई बोझ न था सास जिन्हे मै मम्मी जी कहकर पुकारती थी, ने कभी मुझे घर के किसी काम का बोझ महसूस ही नही होने दिया, दोनो बच्चो  को बड़ी हँसी-खुशी से संभालती थी, रोज़ सुबह 5 बजे ही उठ जाती थी, दूध लाना चाय-नाश्ता बनाना और हमारा टिफिन तैय्यार करना वो इतनी सहजता और तेज़ी से करती की स्वयं मैं चकित रह जाती, शाम का खाना मैं बनाती और सब हँसी-खुशी खाते, मम्मीजी वैसे तो रहने वाली गाव की थी पर उन्हे व्यावहारिक ज्ञान बहुत ! दूध लाना, सब्ज़ी लाना, बिजली पानी का बिल चुकाना, घरके ज़रूरत की चीज़े लाने से लेकर किराया देना आदि सभी काम वो बड़ी कुशलता से कर लेती, हम महीने के शुरू मे ही अपना वेतन लाकर उन्हे सौंप देते और निश्चित हो जाते पर वो महीना समाप्त होने के बाद बचे पैसों को मुझे लौटा देती और समझाती कि बेटा यही उम्र तो कमाने और बचाने की है, अगर मैं कहती की आप ही रख लीजिए तो वो यह कहते हुये  मना कर देती कि अपनी ज़िम्मेदारियाँ अभी से समझो उनके इतना सब करने की ही वजह थी, कि वो अगर गावो 10 दिन के लिए भी जाती तो हम परेशान हो जाते, दीपक तो उन्हें ट्रेन मे बिठाने के साथ वापसी का टिकट  भी खरीद कर दे देते!

पास पड़ोस की औरतें कभी-कभी मम्मीजी को भड़काती, ''अरे, माँ जी, यह उम्र आपकी काम करने की थोड़ी न है, थोडा पूजा-पाठ भजन-कीर्तन किया कीजिए, मम्मीजी तडसे जवाब देती, अपना घर संभालना ही सबसे बड़ा काम है. मैं पूजा-पाठ के ढकोसले मे नही पड़ती और न ही मुझे स्वर्ग जाने की लालसा है. तुम्ही लोग पुण्य कमाओ और स्वर्ग मे अपनी जगह पक्की करो. सब निरुत्तर होजाते इतना सब करने के बावजूद मम्मीजी कभी कोई फरमाइश नही करती उल्टे वो हम सब की ज़रूरतों का धयान रखती थी इसलिए मैं उनके लिए ज़रूरत की सभी चीज़े उनके मना करने पर भी खरीद लाती! कभी कभी मैं कहती थी की मम्मीजी, आप थक गई होंगी, लाइए यह काम मै कर दूं तो वो हंसते हुए कहती की अभी मेरी उम्र 50 की है, घर के काम करने से कोई थक थोड़ी न जाता है! मैं निरुत्तर हो जाती, ऐसे ही हँसी-खुशी दिन बीत रहे थे की दीपक एक रात बोले- संगीता 2 बेटे हो गये हैं! बच्चे पैदा करने से ज़्यादा महत्वपुर्य है, उनकी अच्छी देख-भाल और परवरिश करना उन्हे पढ़ा लिखा कर इस लायक बनाना की वो बड़े हो कर अपने पैरों पर खड़े होकर कमा खा सकें! आज के ज़माने मे दो बच्चे काफ़ी हैं! तुम्हारी अगर सहमति हो तो मैं आपरेशन करा लूँ, बात तो तुम सही कह रहे हो, तुम्हारी राय ही मेरी राय है. पर... “पर क्या”?
मेरी
शुरू से ही यह इच्छा रही थी की मेरे एक बेटी भी हो बेटी ही माँ की सुख दुख की सहभागी होती है और वही माँ का दुख भी समझ पाती है, बेटी बड़ी हो जाने पर माँ की सहेली की भूमिका निभाती हैबेटी ना हो तो समझो घर का आँगन सूना ही रहता है. पर दोनो बार बेटे ही हुए. एक बेटी होती तो अच्छा होता. पर अब किया भी क्या जा सकता है. यार तुम तो बड़ी छिपी रुस्तम निकली, हमारे 2-2 बेटे हो गए पर तुमने अपने दिल की बात आज तक नही बताई, सच कहूँ तो तुम ने मेरे मुँह की बात कह दी, 2 बेटे हो और एक भी बेटी हो तो यह अच्छी बात नही है, हमारे बेटी होगी तो वो तुम्हारी ही तरह सुंदर  होगी, आख़िर हमारी यह इच्छा भी अधूरी क्यूँ रहे? क्रमशः

Tuesday, January 17, 2017

भाग्य और भारतीय - सोच बदलो समाज बदल जाएगा

हम हज़ारों साल गुलाम क्यूँ रहें? 
इस सवाल के चाहे कितने भी कारण गिनायें जाए किंतु असली कारण हमारी भाग्यवादी सोच ही थी! ऐसी सोच के चलते ही हम गुलामी को अपनी तकदीर मान कर चुप चाप उसे स्वीकार कर लिया और गुलाम बनने को राज़ी हो गये, भाग्यवादी  व्यक्ति हर चीज़ को स्वीकार करता चला जाता है और उस के साथ वैसे ही ढलता चला जाता है! समाज में व्यक्ति के लिए केवल दो रास्ते उपलब्ध हैं. एक तो यह की यदि जीवन ग़लत है तो जीवन को बदलो. दूसरा यह की ग़लत जीवन के साथ समझौता कर लो. 
अपने देश के लोग अपनी भाग्यवादी सोच के चलते आमतौर पर दूसरा रास्ता ही चुनते हैं की जैसी भी स्थिति हो उसी के अनुसार खुद को ढाल लो . उस स्थिति को बालने का प्रयास बहुत कम ही लोग करते हैं यदि ग़रीब हैं तो ग़रीबी के साथ यह कह कर समझौता कर लेते हैं की भगवान जो दिया है हम तो उसी में खुश हैं हर व्यक्ति के भाग्या में जो भी लिखा है वही हो रहा है! कुछ अन्यथा नही. हम अपने पिछले जन्म के कर्मों का फल भोगने के लिए ही पैदा हुए हैं, इन्ही में बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपनी सफलताओं को बुरे ग्रहों का प्रभाव मान कर उन्हें पूजापाठ एंव दानदक्षिणा दे कर दूर करने के प्रयास में ही लगे रहते हैं, असफलता के कारणों के जान कर उन्हें दूर करने का प्रयास नही करते हैं, हमारी ऐसी सोच के कारण ही समाज में एक ऐसा परजीवी वर्ग बन गया है जो दानदक्षिणा प्राप्त कर के अपना जीवन मज़े से गुज़ार रहा है!
भाग्यवाद के कारण ही समाज में ऐसा वर्ग पैदा हो गया है, जो यह विश्वास करने लगा, "अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम, दास मलूका कह गये, सब के दाता राम", जहाँ तक मैं समझती हूँ  भिकारियों की जितनी संख्या भारत में है उतनी अन्या कहीं भी नही है ऐसा केवल इसीलिए है की लोगों के मन में यह धारणा बैठ चुकी है कि भिक्षा देने से पुण्या प्राप्त होता है और स्वर्ग में जाने का रास्ता साफ हो जाता हैं, भारत के लोगों ने एक यह भी भ्रम पाल रखा है कि हमारा अतीत तो बहुत उज्ज्वल था किंतु सचाई यह है की जितनें अधिक सुखी हम आज हैं उतने सुखी हम कभी भी किसी भी युग में नही रहे! 
चाहे वो सतयुग हो, चाहे द्वापर या त्रेता युग हो. कलियुग में ही लेगों ने जाना है कि सुख क्या होता है. हमारी आस्था कई प्रकार की ग़लत धारणाओं से बनी हुई हैं, दूसरे देशों के लोग नई नई खोजों से मानव आयु को बढ़ाने में लगे हुए हैं, रोगों को मिटाने में लगे हुए हैं और सफलता भी पा रहे हैं, किंतु भारत के लोग अभी इसी विश्वास में जी रहे हैं की आयु तो ईश्वर तय करता है, आज कई तरहा के भयंकार रोग या महामारियाँ नई नई दवाओं के कारण या तो समाप्त होती जा रही हैं या तो बहुत ही कम हो गयी हैं पहले इनके कारण लाखो लोग मार जाते थे, किंतु हम अभी भी यही राग अलापते जा रहे हैं, की ईश्वर ही बीमार करता है और वही बीमारी को दूर करता है 
अभी भी बहुत से लोगों की सोच अवैज्ञानिक ही बनी हुई है, लोग धर्म पुस्तकों में कही गयी बातों के अलावा और किसी व्यक्ति की बुद्धि को उसके विचार को और विकास को स्वीकार करने को सहज ही तय्यार नही हैं!
संसार में सुख का सृजन धर्म नें नही केवल विज्ञान और टेक्नोलौजी ने पैदा किया है भारत में स्वर्ग एंव मोक्ष का जो प्रचार किया गया उसका मुख्या कारण यही था कि लोग बहुत दुखी थे और उन्हें दुखों से निकलनें का कोई रास्ता दिखाई नही देता था, हिंदुओं की धार्मिक पुस्तकें दुख को जीवन का केंद्र मान कर ही लिखी गयी जान पड़ती हैं 
क्योंकि पुराने लोगों ने सुख का अनुभव बहुत ही कम किया है विज्ञान और टेक्नोलौजी ने ही मानव के लिए सुख भोगने के अवसर प्रदान किए नयी खोजों ने व्यक्ति के देखनेसूनने और चलने की क्षमता को कई गुना अधिक बड़ा दिया. बिजली का अविष्कार एव सूचनातंत्र के अविष्कारों से पूरे संसार को ही बदल दिया है. आज दुनिया मे कोई व्यक्ति दुखी है तो केवल अपनी कमियों एव अभाव के कारण ही है. सभी दुखों को दूर करने के साधन तो अब पैदा कर ही लिए गये हैं यदि कभी वर्षा का अभाव हो जाए तो पश्चिम के लोग कृत्रिम वर्षा करवा लेते हैं किंतु भारतीय लोग वर्षा ना होने पर हवन यगया करने बैठ जाते हैं. हज़ारों सालों से ऐसा ही करते चले आ रहे हैं. पश्चिम के लेगों ने विज्ञान एंव तकनीक की सहायता से अपनी औसत आयु बढ़ा ली है. रोगों पर नियंत्रण पा लिया है, किंतु हम अभी भी 
भाग्या को लेकर बैठे हुए हैं. 
जब सोमनाथ मंदिर पर गजनी ने आक्रमण किया तो वहाँ पाँच सौ पुजारी थे. उनकी यह मान्यता थी की जो ईश्वर सब की रक्षा करता है क्या वह उनकी या अपनी रक्षा नही करेगा. पुजारी प्रार्थना करते रहे और गजनी सबकुछ लूट कर ले गया. यह केवल अंधविश्वास है, कोई वैज्ञानिक चिंतन नही लोगों की भाग्यवादी सोच को बढ़ावा देने के लिए शासक वर्ग ने धर्म की आड़ में खूब प्रचार किया ताकि जनता उनके कुशासन एंव शोषण के खिलाफ विद्रोह की ना सोचे आज भी कई पत्रपत्रिकाएँ भविष्याफल छाप कर लोगों की ऐसी सोच को ही बढ़ावा दे रही हैं बहुत सी पत्रपत्रिकाओं में दैनिक, साप्ताहिक, मासिक एंव वार्षिक भविष्यफल छापे जाते हैं! 
मंत्रिमंडल के शपथग्रहण जैसे कार्य भी शुभ मुहूर्त निकलवा कर ही किए जाते हैं, जिससे ज्योतिषियों को खूब प्रोत्साहन मिलता है, मज़े की बात यह है की बुरे भाग्य को बालने के लिए भी रास्ते सुझाए गये है जिनमे दान-दक्षिणा मुख्य है कोई भी समझदार वयक्ति दान-दक्षिणा के उपाय को जानकार बड़ी आसानी से अनुमान लगा सकता कि यह केवल उन्हे ठगने का प्रयास भर है. दान-दक्षिणा में धन के अलावा सोना, चाँदी, हीरा, मोती, गेहूँ, चावल, गुड, चीनी, भूमि और गाय जैसी वस्तुओं को देने का प्रावधान किया गया. ग्रहों की शांति के लिए दो हज़ार से ले कर सवा लाख तक मंत्र का जाप करने को कहा जाता है ताकि धनी लोग समय के अभाव के कारण पंडित को ही उनके लिए मंत्र जपने को कह दें और बदले में मोटी दक्षिणा दें. बड़ी चालाकी से लोगों को ग्रह शांति के नाम पर ठगा जाता है और भयदोहन सिद्धांत का पूरा पूरा लाभ उठाया जाता है. हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए की भारत में धर्म कभी नही रहा हैं. केवल दर्शिनिक विचारधारायें रही है