Friday, February 3, 2017

Chingari - Hindi Story(Last Part)

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देवर इंजीनियरिंग करने लगा ! हमारे घर फूल सी बेटी भी आ गई! पता ही नही चला समय कैसे भाग रहा था! मैने एम.. भी कर ली थी! नंदो देवर की ज़िम्मेदारी से ज़रा फ़ुर्सत मिली तो जाना मेरा स्वास्थ्य गिरने लगा है खाने-पीने मे ध्यान देने लगी! 4-5साल तो नए कपड़े सिलवाने की ज़रूरत नही पड़ी अपनी शादी और नंदो की शादी पर सिलवाए कपड़ों से काम चलता रहा फिर पुराने फैशन के कपड़ो मे मै स्टाफ मे हँसी का पात्र नही बनना चाहती थी पूरी तनख़्वाह पति को देती थी अपने और बच्चे के लिए कुछ भी लेना होता तो इनसे खर्च माँगना पड़ता ! पहले तो जितना मांगती राजेश दे देते मगर अब पहले पूछते फिर अपनी सलाह देने लगते! इस चीज़ की क्या ज़रूरत है! अभी महीने पहले तो सूट सिलवाया था फिर थोड़े बहुत दे देते मेरी नौकरी के बाद घर का स्तर बढ़ गया था! मै कमाती थी तो अपनी पसंद का क्यूँ खाऊँ पहनूं ! घर मे कभी कोई पुरुष अध्यापक आ जाता तो राजेश को बहुत बुरा लगता धीरे-धीरे मेरे बन-ठन कर रहने पर भी वो कई बार ताना कस देते ! अगले साल मैने डबल एम. कर ली! नोकरी घर का काम, बच्चा और पढ़ाई मे मुझे इनके छोटे- छोटे काम करने की कई बार फ़ुर्सत मिलती! कमीज़ प्रेस करना भूल जाती, बटन लगाना भूल जाती, तो शुरू हो जाते ,चार अक्षर पढ़ क्या गई हो अपनी औकात ही भूल गई,
अब मेरे लिए तुम्हारे पास समय ही कहाँ है! अपने बनने सवरने से समय मिले तभी मेरा काम याद आए! मै समझ नही पा रही थी की राजेश मेरी मुश्किले क्यूँ नही समझते की मै भी इन की तरह नौकरी कर रही हूँ ! और उस से भी अधिक घर का सारा काम , माँ जी बाबूजी की देखभाल ,बच्चे की देख भाल, सब करती हूँ! खुद तो आकर टीवी के सामने बैठ कर हुक्म चलाने लगते हैं! सबसे अधिक जो बात मुझे कचोटती है ! एक तो बैठे-बिठाए हुक्म चलाना, दूसरे ज़रा-ज़रा सी बात के लिए सबके सामने लज्जित करना डांटना जैसे मेरा कोई वजूद ही हो ! मायके वालों के उलाहने, कभी मेरे मायके मे कोई शादी आजाती तो जाने के नाम पर सौ बहाने और खर्च की दुहाई! तब मन और कचोट उठता, जब मुझे अकेले जाना पड़ता! जिस प्रेमप्यार खुशियों की कामना की थी उनका तो कहीं आता पता भी नही था!  
बस एक व्यवस्था के अधीन घर चल रहा था ! समाज के लिए तो छोटी-छोटी बातें हैं पर एक पत्नी के लिए सब कुछ ! फिर एक दिन मेरी पदोन्नति हो गई और मै स्कूल की हेड बन गई ! सारा स्टाफ घर बधाई देने आया ! नया टीचर अनुज भी आया था ! वो मुझे दीदी कहता और मेरा बड़ा सम्मान करता था ! वो सब से अधिक खुश था और इसी खुशी मे बोला मैडम आप हेड बनी है तो स्कूल का अवश्य सुधार हो जायगा ! हम सब आप के साथ है ! मै भी बहुत खुश थी मगर मै देख रही थी ! राजेश को उतनी खुशी नही थी! मैने रात को पूछा ,क्या मेरी प्रमोशन से आप खुश नही है! मुझे क्या हुआ? हां एक बात बता दू ,उस चापलुस लड़के से दूर ही रहा करो कैसे चहक रहा था! मेरी सारी खुशी काफूर हो गई! राजेश मुझे आगाह नही कर रहे थे, यह उनके अंदर जो हीन भावना पनपने लगी थी वो बाहर निकल रही थी! खुद भी मेरे जितने मेहनत करते, मैने कौनसा इन्हे मना किया था! मैने इनसे कई गुना अधिक मेहनत की, सारी ज़िम्मेदारियाँ निभाई, फिर भी यह खुश नही इनको तो मुझ पर नाज़ करना चाहिए! मगर मैं भी पागल थी, औरत का वर्चस्व आदमी से बढ़े यह कैसे उसे सहन हो सकता था! किसी पार्टी मे, किसी के घर कोई मेरी प्रशंसा करता, मुझ से कोई डिस्कशन करता इन्हे अच्छा न लगता अब तो राजेश ने मेरे साथ बाहर जाना भी बंद कर दिया था! इस तरह हमारे बीच का फासला बढ़ने लगा था! 4 साल मानसिक परेशानी से गुज़रे थे! मा जी और बाबूजी का एक ही वर्ष मे निधन हो गया! देवर की नौकरी दूसरे शहर मे लगना दूसरा कारण था! राजेश के इस दुखदाई समय मे मै उन्हे कोई मानसिक कष्ट देना नही चाहती थी! मै उन्हे खुश रखने की हर कोशिश करती वो कुछ भी कहते तो मै चुप रहती! सास और ससुर के न रहने से राजेश को किसी का डर चिंता न रही! धीरे-धीरे राजेश ने दोस्तों के साथ महफिलें सजाना शुरू कर दिया और शराब पी कर घर आने लगे! मेरी समझ मे नही आ रहा था कि उनको क्या हो गया है! उनकी समस्या क्या है! बेटी बड़ी हो रही थी, उस पर क्या प्रभाव पड़ेगा मै मन ही मन मे घुट रही थी, पैसे की कमी नही थी, पर जिस आदमी को जीवन मे आसानी से सब कुछ मिल गया, वो ऐश के सिवा क्या सोच सकता है! मेरा परिवार के लिए समर्पण मेरा कर्तव्य था! मेरी कमाई का सुख सबने भोगा! मगर घर मे मेरी कोई पूछ नही थी, मै सब कुछ सह सकती थी पर राजेश की अय्यशि नही! आज तो हद ही हो गई! 11 बजने वाले थे और राजेश अभी घर नही आए थे! मौसम खराब हो रहा था मै उठी, साथ वाले शर्मा जी को उठाया और उन्हे राजेश के1-2 दोस्तों के पते दिए की उन्हे ढूंड कर लाए शराब इतनी पी रखी थी कि चलते हुए बुरी तरह लड़खड़ा रहे थे शर्मा जी ने पकड़ कर बिस्तर पर लिटाया और चले गये उनके जाते ही यह फट पड़े अब शर्मा जी तुम्हारे हितैषी बन गये मै सब समझता हूँ! पड़ोसियों से मेरी बुराई करके क्या साबित करना चाहती हो? मै समझ गया मेरे पीछे क्या गुल खिलाती हो! अगर मै बुरा लगता हूँ तो जाओ शर्मा जी के घर! मै तुम्हारी अफ़सरी की धौंस मे आने वाला नही! मेरे तन बदन मे एक लावा उठा मगर मै आधी रात को तमाशा खड़ा करना नही चाहती थी! रात भर सोचती रही और एक कठोर निर्णय ले लिया अपना तबादला करवाने का, मै अपने कर्तव्य के विमुख नही हो रही थी, बल्कि राजेश को समझाने के लिए कि मै अन्याय नही सह सकती, इस आशा से भी कि वो समझ सके की जिस पत्नी को वो जूते के बराबर समझते है उसके बिना यह घर और उसका जीवन अधूरा है!
आज बचपन की उस चिंगारी ने मेरे औरत होने के वजूद को जला कर राख कर दिया था! आज मैने एक नया रूप पाया था! मैं अपना तबादला करवा कर दूसरे शहर आ गयी थी! राजेश को वही उसके हाल पर छोड़कर, नही जानती अच्छा किया या बुरा, क्या खोया क्या पाया, स्वाभिमान या अभिमान, मगर मैं जीना चाहती हूँ! अभिमान नही स्वाभिमान का अधिकार चाहिए मुझे नही तो ये चिंगारी मुझे ही नही पूरे समाज को जला कर राख कर देगी!

काश, पुरुष जौहरी होता, सहेज लेता नारी का आस्तित्व, अपना आस्तित्व गंवा कर वो एक पत्थर बन जाएगी! मेरी इस चिंगारी को कसौटी पर कसना समाज का काम है! ज़रूरत भी है समाज के भविषय के लिए!